प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
ब्रह्म कमल
गिरी शिखरों मे सुन्दर खिलता
हँसता रहता ब्रह्म कमल
महकाता फूलों की घाटी
मखमल सा लगता कोमल
निचला भाग बैंगनी हल्का
ऊपर भाग गुलाबी सा
मनह इसका रंग बना है
पुष्प न और जवाबी सा
नित देवों के सिर पर चढ कर
यह धरती निधि बन जाता
बिना स्नान जो तोडता
वो अधर्म कमाता है
ये अगस्त से अक्तूबर तक
बिखराता सौन्दर्य अपार
दर्शक मन्त्रमुग्ध रह जाते
सुषमा इसकी सुबह निहार
शिव प्रतिमा पर शोभा पाता
चढता है केदार के मंदिर
ये सहस्त्रदल कमल अनूठा
पाता मन श्रद्धा और आदर
डा़ चक्रधर नलिन

दीपावली के शुभ अवसर पर आपको और आपके परिवार को शुभकामनाएं
प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
बापू
भारत की पुकार थे बापू
धरती की बहार थे बापू
जो सोचा वो करने वाले
नहीं किसी से डरने वाले
कंटक पथ पर चलने वाले
दीप शिखा से जलने वाले
कभी न राह बदलने वाले
शासक क्रूर मसलने वाले
सत्य अहिंसा हार थे बापू
पावन हृदय विचार थे बापू
भारत को चमकाने वाले
हिन्दी को अपनाने वाले
देश महान बनाने वाले
जग मे प्रेम बढाने वाले
सेवाधर्म सिखलाने वाले
राष्ट्रपिता कहलाने वाले
सच्चे नेक उदार थे बापू
जनता का आधार थे बापू
लेखक डा.चक्रधर नलिन
प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
विग्यान
आओ गोलू,रहीम ,राधा
सीखें हम विग्यान
सुने पेड पौधों की कहानी
जय जय जय विग्यान
बढी उपज उसर हरियाली
मित्र बना विग्यान
टेलोविज़न पहुँच घर घर्
मिटा दिया अग्या
खोले बंद समय के ताल
करके नये अविश्कार
सै हुई ग्रह नक्षत्रों की
रचा नया संसार
इस पर निर्भर भविषय अपन
बना प्रकृति विग्यान्
कम्प्यूटर ने क्राँति मचाई
काम बने आसान
अस्त्र शस्त्र इसके संहारी
रखना इन पर ध्यान
दूर किये दुख रोज़ हजारों
ला मुख की मुस्कान
जय जय जय विग्यान
लेखक-- डा़ चक्रधर नलिन जी
प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
गमला
यग्य कुण्डसा पवित्र गमला
हरा भरा मन भावन गमला
प्रकृति नये रूपों मे लाता
सुन्दरता पौरुश का दाता्
रंग विरंगे फूल खिलाता
शुद्ध वायू से घर भर देता
माता सा उदार है गमला
इसमे सुन्दर पौधे लगते
सुबह शाम को खूब महकते
पाकर धूप लहलहा उठते
जगमग जगमग हर पल होते
सब का चित चुराता गमला
तितली इस पर है मंडराती
हवा इसे नव गीत सुनाती
सभी रोग दुख दूर भगाती
जीवन कैसे जीयें सिखाता
रहा थकान मिटाता गमला
यग्यकुण्ड सा पवित्र गमला
हरा भरा मन भावन गमला
लेखक --डा. चक्रधर नलिन
प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
इच्छा
अम्मा नित्य रात को नभ मे
चँदा मामा क्यों आते हैं
सुबह देख कर सूरज दादा
दूर पहाडी क्यों छुप जाते हैं
सोच रहा हूँचँदा मामा
के संग मे जी भर कर खेलूँ
चन्द्र लोक सीढी से जाऊँ
हँस कर सारे संकट झेलूँ
चन्द्र लोक से रोज बृहपति
ग्रह की यात्रा पर मै जाऊँ
मंगल ग्रह ध्रुव लोक निहारूँ
अमृत कलश वहाँ से लाऊँ
धरती पर मुस्काने बाँटूँ
सब को अमृत बूँद पिलाऊँ
नहीं किसी का करूँ निरादर
सब को अपने गले लगाऊँ
लेखक---- डा. चक्रधर नलिन
प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
वीर पुत्र
वीर सैनिको निर्भय हो कर आगे बढते जाना
सीने पर हंस गोली खाना पीछे लौट नआना
धरती माता को प्रणाम कर,
आगे बढ्ते जाओ
मातृभूमि के लिये युद्ध मे
बढकर शीश कटाओ
किसी मुल्य पर राष्टृ रक्षको लक्षय विजय का पाना
माता बहने चाह रही हैं जय का तिलक लगाना
तुम्हीं यश तेज पराक्रम
तुम गौरव गरिमा हो
उदहारण हो सकल विश्व के
तुम स्वदेश महिमा हो
शपथ शत्रु को करो पराजित,कहता नया जमाना
कदम बढाते चलो निरन्तर समय न तनिक गवाना
जन्म भूमि की रक्षा मे जो
अपने प्राण लुटाते हं
शीश झुकाते सूर्य चन्द्र
मेले पर्व मनाते हैं
खट्टे करना दाँत शत्रु के पीछे फिर मुस्काना
वीरपुत्रब शस्त्र उठाओ पहन युद्ध का बाना
lekhak Dr. Chakardhar Nalin
प्रस्तुतकर्ता
Nirmla Kapila
चन्दा मामा
चन्दा मामा हाथ उठा कर,
भईया जी हैं नित्य बुलाते।
सोते नहीं देखते एक टक ,
कब से इन को खडे सुलाते
आसमान से नाता तोडो,
अपने को धरती से जोडो।
मुस्काते हैं गोद उठाओ,
इन से कभी नहीं मुख मोडो।
इन के संग घोड्र पर बैठो,
इन के संग हाथी पर बैठो।
दूध मलाई जी भर खाऔ,
भईया के घर चन्दा आओ।
लेखक --डा. चक्रधर नलिन जी