नमस्कार, आईये जुडे मेरे इस ब्लांग से, आप अपनी बाल कहानियां, कविताय़ॆ,ओर अन्य समाग्री जो बच्चो से के लायक हो इस ब्लांग मे जोडॆ,आप अगर चाहे तो आप भी इस ब्लांग के मेम्बर बने ओर सीधे अपने विचार यहां रखे, मेम्बर बनने के लिये मुझे इस e mail पर मेल करे, ... rajbhatia007@gmail.com आप का सहयोग हमारे लिये बहुमुल्य है,आईये ओर मेरा हाथ बटाये.सभी इस ब्लांग से जुड सकते है, लेकिन आप की रचनाये सिर्फ़ सिर्फ़ हिन्दी मे हो, आप सब का धन्यवाद

होली की तैयारी......!

प्रस्तुतकर्ता डॉ. मोनिका शर्मा


आओ आओ सारे मिलकर

होली की तैयारी कर लें

सतरंगी रंगों को घोलें

पिचकारी में उनको भर लें।


ऊंच नीच का भाव छोड़कर

सबको रंग देने की ठानें

लाख मनाये कोई हमको

पर हम रंग लगाके मानें


चारो ओर हैं खुशियाँ छाई

आने वाली है अब होली

धूम धड़ाका करने को है

हम सारे बच्चों की टोली


इग्लू,

प्रस्तुतकर्ता Anonymous


                  बने बर्फ के गोल गोल घर
                  इसमें घुसते रेंग रेंग कर 
                  'एस्किमोज़' इसमें रहते हैं
                  इस घर को 'इग्लू' कहते हैं


बेटी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डा० अनिल सवेरा जी की एक अति सुंदर रचना.....

बेटी भी है मुझ को प्यारी
बेटे जितनी ही,
मै बताऊ बातें तुमको
उस की कितनी हे.


छम छम छम छम नाचे जब वो
रॊनक लगती हे,
मोहनी उस की सुरत
सब के मन को लगती हे.


सब कामो मे सब से आगे
वही तो रहती हे
नाम करुंगी रोशन  जग मे
सब से कहती हे

 चित्र लिया गया हे ... mankapakhi.blogspot.com अगर किसी को ऎतराज होगा तो हटा लिया जायेगा,

अपना घर

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डा० अनिल सवेरा जी की एक ओर सुंदर रचना.......


सब से अच्छा अपना घर
जिस मै नही लगता हे डर,

इस मे रहते दादा दादी
जो देते पुरी आजादी.

करते हम अपनी मनमानी
उन से सुनते रोज कहानी.

उनकी सेवा भी हम करते
ममी पापा से नही डरते.

दादा दादी से हमे प्यार
उनके हम पर है उपकार

चिट्ठी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डा० अनिल सवेरा जी दुवारा भेजी एक सुंदर रचना...

चिट्ठी आई, चिट्ठी आई,
जाने किस की चिट्ठी आई
जल्दी जल्दी पढॊ तो इस को,
किस का यह संदेश हे लाई.


यह चिट्ठी है पर्यावरण की,
पुछे दुषित क्यो करते मुझे
वृक्ष विहिन ना करो धरा को,
क्या तुम मोत से भी नही डरते.


सुखी यदि रहना है तुम को,
प्रदुषण ना करो तुम
स्वस्थ रहोगे, रोग मुक्त हो
पर्यावरण जब होगा प्यारा

मन

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह कविता भी हमे डा० अनिल सवेरा जी ने भेजी है, हम सब की ओर से उन का धन्यवाद.



मन तो मेरा भी करता हे,
आसमान को छु लूं मै.
पकड पकड बुंदे बारिश की
चढ कर इन पर झुलु मै


छोडू कुछ पढना वढना,
जी भर शोर मचाऊं मै,
जो भी मेरे जी को भाये,
उस को जी भर कहुं मै.


मस्त रहुं ओर खेलु कुदु,
तनाव जरा ना झेलू मै,
जो भी मुझ को पसंद चीज हो,
झट से उस को ले लूं मै.

मोका !!!

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह सुंदर  बाल कविता भी हमे अनिल सवेरा जी ने भेजी है. धन्यवाद

चीनू चुहिया, बिल मे बेठी
गुप चुप झांक रही थी,
बाहर बेठी बिल्ली मोसी,
मोका तांक रही थी.




मोसी बोली बडे  प्यार से,
बेटी बाहर आओ,
क्यो हो सहमी डरी डरी सी,
कारण तो बतलाओ.




तुम्हारी तो मोसी हुं मै,
मुझ से क्यो डरती हो,
दुंगी तुम को चाकलेट टाफ़ी
विशवास अगर करती हो.




चालाक चीनू समझ गई
बिगडी बिल्ली की बातें,
बाहर ना आऊंगी बिलकुल,
जानू तेरी ओकात

  चित्र लिये हे abhivyakti  से ऎतराज होने पर हटा दिये जायेगे, उन का धन्यवाद

टक्कर

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह रचना भी हमे डा० अनिल सवेरा जी ने जगाधरी से भेजी है, बहुत अच्छी अच्छी ओर मन भावन कविताये लिखते है, प्रस्तुत है यह रचना, तो बच्चो सब से पहले डा अनिल अंकल का धन्यवाद तो करो ना, चलो सब से पहले मै उन्हे दिल से आभार कहता हुं तो सब पाठको की तरफ़ से उन्हे धन्यवाद.

टक्कर

हाथी जी को, आया चक्कर,
मच्छर ने जब मारी टक्कर,
टक्कर मार खुशी से नाचा,
खाने लगा, मजे से शक्कर!!




बोला हाथी, नही छोडूंगा,
हाथ पांव तेरे तोडुंगा,
क्रोध दिला मत मुझ को ज्यादा,
नही तो तेरा सर फ़ोडुंगा.



मुस्कुरा कर मच्छर बोला,
करो तो कुछ, तुम अपना ध्यान,
फ़ुंक मजाक मे ही मारु तो,
पहुंच जाओगे, तुम शमशान.

डा० अनिल सवेरा जी

माफ़ी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डा० अनिल सवेरा जी की एक अति सुंदर कविता.......

माफ़ी
बंदर बाबु झुला झुलें,
लेकिन बंदरिया को भुले.
बंदरिया हो गई नाराज,
बोली मै तो लडुंगी आज.


अकेले झुला क्यो झुले तुम,
अपनी पत्नी को क्यो भुळे तुम.
तुम ने तोड दिया दिल मेरा,
आग बावुला हुआ मेरा तन.


बंदर जी ने मांगी माफ़ी,
बोले इतना क्रोध है काफ़ी.
अब ना कभी अकेला झुलू,
प्राण प्रिय ना तुम को भुलु.

हिन्दी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह सुंदर कविता भी हमे डा० अनिल सवेरा जी ने भेजी है, तो बच्चो सब से पहलेअनिल जी का धन्यवाद.
हिन्दी


हिन्दी हम सब की हमजोली,
यही तो अपनी प्यारी बोली.

इस से अपना सम्मान,
भारतियो की हे यही तो पहचान.


सागर सा हे इस का दिल
सब मे  जाती यह घुलमिल


प्यार भरा हे इस मै इतना,
गगन विस्तरित लगता जितना.

भाषा जिस ने यह अपनाई,
सुख शांति  समृद्धि पाई

नया जमाना

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह सुंदर कविता भी हमे डा० अनिल सवेरा जी ने भेजी है.....


मुन्ना मुन्नी पुछें नानी,
क्यो नही कहती कोई कहानी.
कहां गई परियो की बातें, 
कहां गये वो राजा रानी.


नानी बोली.....
कया बतलाऊं तुमको बच्चो,
अब आ गया हे नया जमाना.
कम्पूटर ओर टी वी का अब,
हर बच्चा हो गया दिवाना.


टेंशन से मिले ना फ़ुरसत,
हम को वर्क भी मिलता ज्यादा.
बुलंदियो को बस छू ले हम,
हर बच्चे का यही इरादा.

सॊगात

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह सुंदर कविता हमे अनिल सवेरा जी ने इ मेल से भेजी है, उन की बहुत सी कविताये मै समय समय पर प्रकाशित करता हुं, आज की सुंदर कविता भी उन्होने भेजी है.....धन्यवाद

सॊगात


मन को  टाटोलो जालिमो,
क्या चीख सुनती है.
नन्ही सी जान गर्भ मे,
कुछ सपने बुनती है.


रोशन करुंगी जग मे,
मै अपने कुल का नाम.
दोनो घरो को बनाऊ गी मै,
इस धरा पर धाम.


करुंगी ना कभी भी,
अधिकार की मै बात
जन्म मुझो को दो मां,
बस यही हे सॊगात

माँ को गोदी

प्रस्तुतकर्ता डॉ. मोनिका शर्मा


माँ की गोदी कितनी प्यारी
नरम मुलायम न्यारी- न्यारी


धीमी थपकी झीना आँचल
गोदी में माँ की खुशबू हर पल

इसमें सिमटकर मैं सो जाऊं
सुंदर सपनों में खो जाऊं

सपनों में भी माँ ही आए
मुझे हमेशा यह समझाए


अच्छा बनना सच्चा बनना
तू तो सबका बच्चा बनना


अपना पराया कभी करना
भेदभाव से दूर ही रहना

सबको होगा तुम पर नाज़
तुम करोगे दिलों पे राज़।











मम्मी ने थी खीर बनाई

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह बाल कविता हमे अनिल सवेरा जी ने भेजी है, आप के पास भी कोई सुंदर सी बाल कविता तो तो हमे भेजे, कोई चित्र, या कुछ भी जो बच्चो से समबंधित हो हमे भेजे, हम उसे यहां प्रकाशित करेगे.


मम्मी जी ने थी खीर बनाई,
मुन्ना  ने जी भर कर खाई.


मुन्नी को दी बिलकुल थोडी,
निकली है उस मै भी रोडी.

मुन्नी लगी जोर से रोने,
मां को दिये ना कपडे धोने.

दी मां ने फ़िर भर कटोरी,
लगी मटकने पोरी पोरी

पैसे

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह बाल कविता भी हमे अनिल सवेरा जी ने भेजी है

बंदर बाबु पेंट पहन कर
पहुंच गये ससुराल.

खा के मीठा पान उन्होने
होंठ कर लिये लाल

बंदरिया भी सम्रार्ट बन गई
पहन के लंहगा चोली

खाऊंगी मै रस मलाई
बंदर से वह बोली

रस मलाई खाते कैसे?
पास नही था पैसा


लोट के घर को आये ऎसे
बंधु गये थे जेसे

उपहार

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

  यह प्यारी सी कविता हमे भेजी है, कवि राज  डां अनिल सवेरा जी ने, अगर आप भी कोई बाल कविता भेजना चाहे या आप इस ब्लांग से जुडना चाहे तो हमे मेल करे, आप सब का स्वागत है.

उपहार

पापा ले  आये एक माला,
मुन्नी ने था  भगंडा डाला.




माला लगी उसे बडी प्यारी,
खुश थी  उस की सखियां सारी.



पहन  उसे वह गई स्कूल,
लिया  वहां  से गुलाब का फ़ुल.


पापा को दिया  उपहार,
पापा ने किया बहुत प्यार

सच्ची मित्रता......

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डां अनिल सवेरा जी कि एक ओर सुंदर रचना आप सब के लिये....आप भी अपनी रचनाये भेज सकते है, या फ़िर इस ब्लांग पर मेम्बर बन कर खुद ही अपनी रचनाये प्रकाशित कर सकते है. धन्यवाद

कहती है पुस्तके सब से,
सुनो  हमारी    बात.


हम सब सच्ची मित्र  तुम्हारी,
देती   हर   दम  साथ.


मंजिल पर  पहुचाती सब को,
कभी नही भटकाटी.


मित्रो  बना जो है हम सब का,
उस को राह दिखाती



इसी लिये हम कहती सब को,           पुस्तको का चित्र गुगल से लिया है
बनो मित्र हमारे.                         किसी के ऎतराज पर हटा दिया जायेगा

सचमुच  सारी दुनिया  को तुम,
लगोगे सब से प्यारे

नही पियुंगा दुध...

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह सुंदर बाल कविता भी डां अनिल सवेरा जी की सुंदर क्लम से लिखी गई है, ओर मेल से हमे मिली. ओर आप के सामने पेश है....


टै टै कर के  देखो तोता,
करता कितना  शोर.


ठुमक ठुमक नाच दिखाता,
अच्छा लगता  मोर.

तोता कहता खाऊंगा मै
दो मिठ्ठे अमरुद



मोर कहे दाना खाऊंगा
नही पियूंगा दुध.

हे! हंस वाहनी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

आज की यह सुंदर कविता भी हमे कवि डां अनिल सवेरा जी ने ही भेजी है, उन की बहुत इच्छा हैदकि उन की एक बाल कविता के रुप मे पुस्तक छपे,मै यही आशा करता हुं कि इन की एक नही अनेक पुस्तके हिन्दी मै ओर बाल कविता के रुप मै
छपे, शुभकामनाओ सहित.
हे! हंस वाहनी


हे हंस वाहनी हम को दो,
विधा का वरदान मां.
अलोकित हो जाये जीवन,
ऎसा दो तुम ग्याण मा.

हे! हंस वाहनी ......
भूल से भी भूले ना हम,
सदाचार का मार्ग मां.
कुसगंति से सदा बचे हम,
अपनाये ना कूमार्ग मां.

हे! हंस वाहनी .......
विश्व बन्धुतव का भाव बढाना,
मन मे बढाना प्यार मां.
सब की करे सदा सेवा हम,
करना इतना उपकार मां.

हे! हंस वाहनी ......


कवि डां अनिल सवेरा

गुरु जी हमारे है भगवान.

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

इस कविता के रचियता भी कविे डां अनिल सवेरा जी है, तो बच्चो आप बताये केसी लगी यह कवि


गुरु जी हमारे है भगवान.

बहुत अच्छे है हमारे सर ,
लगता नही उन से   डर.


समय पर वो कक्षा मै आते,
बहुत लगन से हमे पढाते.

डंडे का नही करते प्रयोग,
पल पल का करते सदपुयोग.


विषय को भी सरल बताते,
बडी रुचि से हमे पढाते.

रोचक है पढाने का तरीका,
आता खुब हंसाने का तरीका.


सब बच्चे उन को है चाहते,
सब के मन को भी बांधे

कविे डां अनिल सवेरा