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ब्रह्म कमल -बाल कविता

प्रस्तुतकर्ता निर्मला कपिला

ब्रह्म कमल
गिरी शिखरों मे सुन्दर खिलता
हँसता रहता ब्रह्म कमल
महकाता फूलों की घाटी
मखमल सा लगता कोमल

निचला भाग बैंगनी हल्का
ऊपर भाग गुलाबी सा
मनह इसका रंग बना है
पुष्प न और जवाबी सा

नित देवों के सिर पर चढ कर
यह धरती निधि बन जाता
बिना स्नान जो तोडता
वो  अधर्म कमाता है

ये अगस्त से अक्तूबर तक
बिखराता सौन्दर्य अपार
दर्शक मन्त्रमुग्ध रह जाते
सुषमा इसकी सुबह निहार

शिव प्रतिमा पर शोभा पाता
चढता है केदार के मंदिर
ये सहस्त्रदल कमल अनूठा
पाता मन श्रद्धा और आदर
    डा़ चक्रधर नलिन

10 आप की राय:

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना, आप का ओर डा़ चक्रधर नलिन का धन्यवाद

Devendra said...

वाह!

Bhoopendra a media man said...

behad khoobshurat kavita hai.
dhanaybad.

सुलभ सतरंगी said...

एक उत्कृष्ट रचना सुन्दर कमल जैसा !!

सुलभ सतरंगी said...

निर्मला कपिला जी और डा़ चक्रधर नलिन जी का धन्यवाद!

लोकेन्द्र said...

सुन्दर.....

KAVITA RAWAT said...

गिरी शिखरों मे सुन्दर खिलता
हँसता रहता ब्रह्म कमल
महकाता फूलों की घाटी
मखमल सा लगता कोमल

Maa ji or Dr. Nalin ji ko is sundar dil chhu jane wali prastuti ke liye shubhkamnayen.

KAVITA RAWAT said...
This post has been removed by the author.
JHAROKHA said...

Bahut sundar kavita----Nalin ji ko hardik shubhakamnayen.
Poonam

Vivek VK Jain said...

sir, aap ki kavita sach much achhhi h........
likhte rahiye, yese hi.

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