डा० अनिल सवेरा जी की एक ओर सुंदर रचना.......
सब से अच्छा अपना घर
जिस मै नही लगता हे डर,
जो देते पुरी आजादी.
करते हम अपनी मनमानी
उन से सुनते रोज कहानी.
उनकी सेवा भी हम करते
ममी पापा से नही डरते.
दादा दादी से हमे प्यार
उनके हम पर है उपकार
डा० अनिल सवेरा जी दुवारा भेजी एक सुंदर रचना...
चिट्ठी आई, चिट्ठी आई,
जाने किस की चिट्ठी आई
जल्दी जल्दी पढॊ तो इस को,
किस का यह संदेश हे लाई.
यह चिट्ठी है पर्यावरण की,
पुछे दुषित क्यो करते मुझे
वृक्ष विहिन ना करो धरा को,
क्या तुम मोत से भी नही डरते.
सुखी यदि रहना है तुम को,
प्रदुषण ना करो तुम
स्वस्थ रहोगे, रोग मुक्त हो
पर्यावरण जब होगा प्यारा
अरे बच्चो बहुत् दिन हो गये कोई गीत ही नही सुना ना... तो चलो आज तुम्हे एक ऎसा गीत सुनाते है, जि सिर्फ़ तुम्हे ही नही, तुम्हारे मां बाप को भी बहुत पसंद आयेगा....तो जल्दी से पालती मार कर बेठो ओर ध्यान से सुनो...
यह कविता भी हमे डा० अनिल सवेरा जी ने भेजी है, हम सब की ओर से उन का धन्यवाद.
मन तो मेरा भी करता हे,
आसमान को छु लूं मै.
चढ कर इन पर झुलु मै
छोडू कुछ पढना वढना,
जी भर शोर मचाऊं मै,
जो भी मेरे जी को भाये,
उस को जी भर कहुं मै.
मस्त रहुं ओर खेलु कुदु,
तनाव जरा ना झेलू मै,
जो भी मुझ को पसंद चीज हो,
झट से उस को ले लूं मै.
प्रस्तुतकर्ता
डॉ. मोनिका शर्मा
दीपक बन कर जलना सीखें
घोर तिमिर का नाश करें
हृदयाकाश आलोकित हो
ज्योतिर्मय विश्वास भरें
सभी को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनायें.......
यह सुंदर बाल कविता भी हमे अनिल सवेरा जी ने भेजी है. धन्यवाद
चीनू चुहिया, बिल मे बेठी
बाहर बेठी बिल्ली मोसी,
मोका तांक रही थी.
मोसी बोली बडे प्यार से,
बेटी बाहर आओ,
क्यो हो सहमी डरी डरी सी,
कारण तो बतलाओ.
तुम्हारी तो मोसी हुं मै,
मुझ से क्यो डरती हो, दुंगी तुम को चाकलेट टाफ़ी
विशवास अगर करती हो.
चालाक चीनू समझ गई
बिगडी बिल्ली की बातें,
जानू तेरी ओकात
चित्र लिये हे abhivyakti से ऎतराज होने पर हटा दिये जायेगे, उन का धन्यवाद
प्रस्तुतकर्ता
डॉ. मोनिका शर्मा
हे माँ अम्बे जय जगदम्बे हमको दीजे ये वरदान
कभी ना खंडित होने दें
हम मातृभूमि का मान वरद हस्त सिर पर रख माता दिव्य चेतना भर दो मन में समरसता की शुभ ज्योति को फैलायेंगें हम कण -कण में भारत माँ के सारे बच्चे सिंह रूप हम धर लेंगें दिव्य धरा का मान बचाने हर बाधा से लड़ लेंगें विंध्य, हिमाचल, अरावली का ना झुकने दें माथा देव भूमि है धरा हमारी गायें सब मिल गाथा पौरुषता का तेज भरो माँ हम भगत, सुभाष बनें जग-सिरमौर बने फिर भारत माँ भारती का विश्वास बनें
चैतन्य का कोना ब्लॉग पर विजय माथुर जी टिप्पणी के शब्द इस रचना के लिए प्रेरणा बने..... उनकी ह्रदय से आभारी हूँ....
यह रचना भी हमे डा० अनिल सवेरा जी ने जगाधरी से भेजी है, बहुत अच्छी अच्छी ओर मन भावन कविताये लिखते है, प्रस्तुत है यह रचना, तो बच्चो सब से पहले डा अनिल अंकल का धन्यवाद तो करो ना, चलो सब से पहले मै उन्हे दिल से आभार कहता हुं तो सब पाठको की तरफ़ से उन्हे धन्यवाद.
टक्कर
हाथी जी को, आया चक्कर,
मच्छर ने जब मारी टक्कर,
टक्कर मार खुशी से नाचा,
खाने लगा, मजे से शक्कर!!
बोला हाथी, नही छोडूंगा,
हाथ पांव तेरे तोडुंगा,
क्रोध दिला मत मुझ को ज्यादा,
नही तो तेरा सर फ़ोडुंगा.
मुस्कुरा कर मच्छर बोला,
करो तो कुछ, तुम अपना ध्यान,
फ़ुंक मजाक मे ही मारु तो,
पहुंच जाओगे, तुम शमशान.
डा० अनिल सवेरा जी