नमस्कार, आईये जुडे मेरे इस ब्लांग से, आप अपनी बाल कहानियां, कविताय़ॆ,ओर अन्य समाग्री जो बच्चो से के लायक हो इस ब्लांग मे जोडॆ,आप अगर चाहे तो आप भी इस ब्लांग के मेम्बर बने ओर सीधे अपने विचार यहां रखे, मेम्बर बनने के लिये मुझे इस e mail पर मेल करे, ... rajbhatia007@gmail.com आप का सहयोग हमारे लिये बहुमुल्य है,आईये ओर मेरा हाथ बटाये.सभी इस ब्लांग से जुड सकते है, लेकिन आप की रचनाये सिर्फ़ सिर्फ़ हिन्दी मे हो, आप सब का धन्यवाद

पैसे

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह बाल कविता भी हमे अनिल सवेरा जी ने भेजी है

बंदर बाबु पेंट पहन कर
पहुंच गये ससुराल.

खा के मीठा पान उन्होने
होंठ कर लिये लाल

बंदरिया भी सम्रार्ट बन गई
पहन के लंहगा चोली

खाऊंगी मै रस मलाई
बंदर से वह बोली

रस मलाई खाते कैसे?
पास नही था पैसा


लोट के घर को आये ऎसे
बंधु गये थे जेसे

निर्वात,हाईड्रोलिक ब्रेक एवं वायु दबाव

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

बच्चो आओ आज आप को हम एक विज्ञानिक जी से मिलवाते है, यह  है हमारे दर्शन लाल बवेजा जी,विज्ञान अध्यापक (शिक्षा विभाग, हरियाणा) से

तो चले इन के अविषकार देखे......

आवश्यक सामग्री ---- दो इंजक्शन की सिरिंज ,तीन इंच पाइप का टुकड़ा 
सिद्धांत ---- वायु दबाव, निर्वात (Vaccum)
बनाने की विधि---- कार्य विधि----दो इंजक्शन की सिरिंज ले कर उन्हें एक तीन इंच के पाइप के टुकड़े से जोड़ देते है | पाइप और  इंजक्शन की सिरिंज के जोड़ एयर टाइट होने चाहिए इस के लिए हम किसी भी अच्छे चिपकने वाले पदार्थ जैसे फैवी क्विक का प्रयोग कर सकते है | जोड़ते वक्त एक  सिरिंज का पिस्टन 1\2 की अन्दर और दूसरी सिरिंज का पिस्टन पूरा बहार की और होना चाहिए |
पुरा पढने के लिये यहां किल्क करे 

उपहार

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

  यह प्यारी सी कविता हमे भेजी है, कवि राज  डां अनिल सवेरा जी ने, अगर आप भी कोई बाल कविता भेजना चाहे या आप इस ब्लांग से जुडना चाहे तो हमे मेल करे, आप सब का स्वागत है.

उपहार

पापा ले  आये एक माला,
मुन्नी ने था  भगंडा डाला.




माला लगी उसे बडी प्यारी,
खुश थी  उस की सखियां सारी.



पहन  उसे वह गई स्कूल,
लिया  वहां  से गुलाब का फ़ुल.


पापा को दिया  उपहार,
पापा ने किया बहुत प्यार

सच्ची मित्रता......

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डां अनिल सवेरा जी कि एक ओर सुंदर रचना आप सब के लिये....आप भी अपनी रचनाये भेज सकते है, या फ़िर इस ब्लांग पर मेम्बर बन कर खुद ही अपनी रचनाये प्रकाशित कर सकते है. धन्यवाद

कहती है पुस्तके सब से,
सुनो  हमारी    बात.


हम सब सच्ची मित्र  तुम्हारी,
देती   हर   दम  साथ.


मंजिल पर  पहुचाती सब को,
कभी नही भटकाटी.


मित्रो  बना जो है हम सब का,
उस को राह दिखाती



इसी लिये हम कहती सब को,           पुस्तको का चित्र गुगल से लिया है
बनो मित्र हमारे.                         किसी के ऎतराज पर हटा दिया जायेगा

सचमुच  सारी दुनिया  को तुम,
लगोगे सब से प्यारे

नही पियुंगा दुध...

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

यह सुंदर बाल कविता भी डां अनिल सवेरा जी की सुंदर क्लम से लिखी गई है, ओर मेल से हमे मिली. ओर आप के सामने पेश है....


टै टै कर के  देखो तोता,
करता कितना  शोर.


ठुमक ठुमक नाच दिखाता,
अच्छा लगता  मोर.

तोता कहता खाऊंगा मै
दो मिठ्ठे अमरुद



मोर कहे दाना खाऊंगा
नही पियूंगा दुध.

हे! हंस वाहनी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

आज की यह सुंदर कविता भी हमे कवि डां अनिल सवेरा जी ने ही भेजी है, उन की बहुत इच्छा हैदकि उन की एक बाल कविता के रुप मे पुस्तक छपे,मै यही आशा करता हुं कि इन की एक नही अनेक पुस्तके हिन्दी मै ओर बाल कविता के रुप मै
छपे, शुभकामनाओ सहित.
हे! हंस वाहनी


हे हंस वाहनी हम को दो,
विधा का वरदान मां.
अलोकित हो जाये जीवन,
ऎसा दो तुम ग्याण मा.

हे! हंस वाहनी ......
भूल से भी भूले ना हम,
सदाचार का मार्ग मां.
कुसगंति से सदा बचे हम,
अपनाये ना कूमार्ग मां.

हे! हंस वाहनी .......
विश्व बन्धुतव का भाव बढाना,
मन मे बढाना प्यार मां.
सब की करे सदा सेवा हम,
करना इतना उपकार मां.

हे! हंस वाहनी ......


कवि डां अनिल सवेरा

गुरु जी हमारे है भगवान.

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

इस कविता के रचियता भी कविे डां अनिल सवेरा जी है, तो बच्चो आप बताये केसी लगी यह कवि


गुरु जी हमारे है भगवान.

बहुत अच्छे है हमारे सर ,
लगता नही उन से   डर.


समय पर वो कक्षा मै आते,
बहुत लगन से हमे पढाते.

डंडे का नही करते प्रयोग,
पल पल का करते सदपुयोग.


विषय को भी सरल बताते,
बडी रुचि से हमे पढाते.

रोचक है पढाने का तरीका,
आता खुब हंसाने का तरीका.


सब बच्चे उन को है चाहते,
सब के मन को भी बांधे

कविे डां अनिल सवेरा

गुब्बारा, बालून

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

                                                  गुब्बारे  / Balloon

बच्चो आज की कविता भी हमे  डां अनिल सवेरा जी ने भेजी है, ओर आप सब से माफ़ी चाहूंगा कि आज की बाल कविता मै एक शब्द अग्रेजी का आ रहा है, लेकिन इस को हटाने के लिये मुझे अनिल सवेरा जी से पूचना पडता, तो चलिये आज ... ऎसे ही सही......


                                      गुब्बारा, बालून
पापा ले आये बालून,
उड पहुचा वो देहरादून.

देहरा दून मै खाई लिची,
देखी पहाडियां ऊंची नीची.


मजा आ गया कर के सेर,
धरती पर नही  टिकता पेर.

कर के सेर वो वापिस लोटा,
हो गया था काफ़ी मोटा.

कवि डां अनिल सवेरा जी