गुब्बारे / Balloon
बच्चो आज की कविता भी हमे डां अनिल सवेरा जी ने भेजी है, ओर आप सब से माफ़ी चाहूंगा कि आज की बाल कविता मै एक शब्द अग्रेजी का आ रहा है, लेकिन इस को हटाने के लिये मुझे अनिल सवेरा जी से पूचना पडता, तो चलिये आज ... ऎसे ही सही......
गुब्बारा, बालून
पापा ले आये बालून,
उड पहुचा वो देहरादून.
देहरा दून मै खाई लिची,
देखी पहाडियां ऊंची नीची.
मजा आ गया कर के सेर,
धरती पर नही टिकता पेर.
कर के सेर वो वापिस लोटा,
हो गया था काफ़ी मोटा.
कवि डां अनिल सवेरा जी
यह सुंदर बाल कविता भी हमे डां अनिल सवेरा जी ने भेजी है, अगर आप भी कोई बाल कविता हमे भेजना चाहे तो भेजियेगां, हम उसे जरुर यहां प्रकाशित करेगे, डां अनिल जी का धन्यवाद.
ऒस की बूंदे
नन्ही मुन्नी ऒस की बूंदे
करती है मन को शीतल
लगता है मानो ऎसा
हमे पुकारे यह प्रति पल
स्पर्श सुर्य की किरणो का
कर देता इन को उज्जवल
यह बाल कविता भी हमे कवि डा अनिल सवेरा जी ने भेजी है.
लोमडी काकी, पहन के चप्पल,
चली खरीदने मीठा एप्प्ल .
एप्पल लगा उसे बडा मंहगा,
खरीद लिया उस ने लंहगा
लंहगा पहन लगी इतराने.
लोमड जी लगे मुस्कुराने.
अटका पांव तभी जल्दी मै
बोली ठीक थी मै साडी मै.
अब नही लंहगा पहनूंगी.
साडी मै ही खुश रह लुंगी
डां अनिल सवेरा
यह कविता भी हमे डां अनिल सवेरा जी ने भेजी है.
गुन गुना कर मच्छर जी ने
कान खा लिये रात
कहां कहां नही काटा उसने
क्या बताये बात.
मुंह पर काटा, हाथ भी काटा
काटे दोनो पांव
काट लिया शरीर सारा
लगा जहां भी दांव
तरकीब लडाई जितनी भी
वो सारी हो गई फ़ेल
मच्छर जी ने रात भर
बनाई हमारी रेल
Dr.anil savera
यह कविता भी मुझे डां अनिल सवेरा जी ने भेजी है , ओर मै यहां सब बच्चो के नाम इसे प्रकाशित कर रहा हुं.
साढे पिंड बिच लग्या मेला
मै बापू नाल ग्या अकेला
बज रिया सी पॊ पॊ वाजा
झुले वाला केन्दा आजा
खिडोने बिकदे प्यारे प्यारे
बिकदे सी रंग बिरंगे गुब्बारे
मिठ्ठाई वेखी ते टपकी लार
जादुगर दा शो तेयार
घुमे अस्सी मज्जे नाल मेला
रेह्या जेब चा ना ईक भी धेला
Dr. Anil savera
प्यारे बच्चो यह कविता भी हमे अकल डां अनिल सवेरा जी ने आप सब के लिये भेजी है, आशा करता हू आप सब को पसंद आये, अगर पसंद आये तो अकल अनिल सवेरा जी को धन्यवाद जरुर कहे
हाथी जी को, आया चक्कर,
मच्छर ने जब मारी टक्कर,
टक्कर मार, खुशी से नाचा,
खाने लगा, मजे से शक्कर!!
बोला हाथी, नही छोडुंगा,
हाथ -पांव तेरे तोडूंगा,
क्रोध दिला मत मुझको ज्यादा,
नही तो तेरा सर फ़ोडूंगा.
मुस्कुरा कर मच्छर बोला,
करो तो कुछ,तुम अपना ध्यान,
फ़ूक मजाक मै ही मारू तो,
पहुच जाओगे, तुम शमशान.
लेखक डां अनिल सवेरा
यह चित्र मेने josh18.in.com से लिया है, उन का आभार,एतराज होने पर हटा दिया जायेगा
यह रचना मुझे इ मेल से आज डां अनिल सवेरा जी ने भेजी है हरियाणा से, ओर मुझे बहुत अच्छी लगी तो मेने इसे यहां प्रकाशित कर दिया, तो बच्चो आओ ओर सब से पहले डां अनिल जी का धन्यवाद करे... ओर फ़िर देखे यह सुंदर सी बाल कविता जो होली के रंग मै पुरी तरह से रंगी है.
होली का त्योहार अनोखा,
जिस मे है उत्साह.
बिल्ली मोसी को रंग कर
चुहा भी बोला वाह!!
हिरण आज कुचांले भरता
बना हुआ है शेर.
रंगा शेर को प्यार के रंग मे,
शेर रहा ना शेर.
एक अचंभा ऎसा देखा
उल्लू खेले दिन मे होली,
लोमडी काकी सजा रही है
रंगो से सुंदर होली.
होली का त्योहार अनोखा,
जिस मे है उत्साह.
बिल्ली मोसी को रंग कर
चुहा भी बोला वाह!!
प्रस्तुतकर्ता
gazalkbahane
आओ बच्चो,पाठ पढ़ाऊं
एक अनूठी बात बताऊं
काले अक्षर हीरा मोती
फ़ैलाते ये ज्ञान की ज्योति
अक्षर जुड़कर शब्द बनायें
शब्द मिलें बोली बन जायें
बोली संवरे भाषा कहलाये
भाषा से पुस्तक छप जाये
बात पुस्तकों की है न्यारी
पुस्तक होती ज्ञान पिटारी
पुस्तक पुस्तकालय में आकर
गागर में भर जाये सागर
पढने लिखने से फ़ैले ज्ञान
भाषा है मानव की पहचान
श्याम सखा श्याम