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संज्ञा

प्रस्तुतकर्ता इंदु पुरी गोस्वामी

प्यारे नन्हे मुन्ने बच्चो!
प्यार
व्याकरण से बहुत घबराते हो न?क्या करे कुछ तो ये होती ही नीरस उस पर स्कूल्स में हम टीचर्स इसे पढ़ते भी है बड़े उबाऊ तरीके से. मैंने तुम्हारे लिए कई कोर्स की जरूरी जानकारियों को छोटी छोटी कविता का रूप दे दिया है जिन्हें तुम गा गा कर याद कर सकते हो.अच्छी न लगे तो बताना.
देखो भाई मैं तो अपने स्कूल के बच्चों को ऐसे ही पढ़ाती हूँ.क्या करूं?
ऐसीच हूँ मैं तो.
किन्तु बच्चों से बहुत बहुत प्यार करती हूँ और मेरे स्कूल के बच्चे भी मुझे बहुत प्यार करते हैं.अब तुम्हारा प्यार पाना चाहती हूँ.
हा हा हा 
मुझसे दोस्ती करोगे न? तो लो ये एक कविता तुम्हारे लिए.

संज्ञा संज्ञा क्या करते हो? 
संज्ञा किसको कहते हैं?
व्यक्ति,वस्तु,स्थान,भाव के 
'नाम' को संज्ञा कहते हैं.

सर्वनाम

प्रस्तुतकर्ता इंदु पुरी गोस्वामी

संज्ञा के स्थान पर जो शब्द काम आते हैं
हिंदी भाषा में वे सारे सर्वनाम कहलाते हैं.

स्लेज

प्रस्तुतकर्ता इंदु पुरी गोस्वामी

बिन पहिये की ये है गाडी 
सामान लादो या करो सवारी
रेनडियर या कुत्ते इसको खींचते है
इस गाडी को 'स्लेज' सब कहते हैं

इग्लू,

प्रस्तुतकर्ता इंदु पुरी गोस्वामी


                  बने बर्फ के गोल गोल घर
                  इसमें घुसते रेंग रेंग कर 
                  'एस्किमोज़' इसमें रहते हैं
                  इस घर को 'इग्लू' कहते हैं


"मुनुआ रोये ऊं ऊं ऊं "

प्रस्तुतकर्ता डॉ. नागेश पांडेय संजय


प्यारे बच्चों ! 
मेरे पड़ोस में एक छोटा सा बच्चा रहता है .
 उसका नाम है मुनुआ .
 हर रोज उसका एक अजीबोगरीब सवाल होता है .
 एक बार उसने पूछा -
 "अम्मा मेरे मूंछ न क्यों ?"
माँ ने जबाब तो दिया , मगर ...! मगर... ? 
 तो तुम खुद ही  पढो न यह बाल गीत . 
सारी बात जान जाओगे . 
हाँ मुझे बताना जरुर , तुम्हें कैसा लगा यह बाल गीत ?
 बताओगे न ? 
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डा. नागेश पांडेय 'संजय'का बाल गीत :
"मुनुआ रोये ऊं ऊं ऊं "

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मुनुआ  रोए ऊँ ऊं ऊं
अम्मा मेरे मूंछ न क्यों ?

 चाचा मुझे चिढाते  है 
अपनी मूंछ दिखाते है
 हंस हंस कर बतलाते है
 मूंछ तुम्हारे थी लेकिन
 बिल्ली आई चाट गयी
 अम्मा अम्मा   बोलो  तो
 क्या चाचा की बात सही
 बात सही हो तो नकटी
 बिल्ली की मूंछे नोचू .
 बोलो बोलो मूंछ न क्यों

अरे अभी तू छोटा है 
और नहीं तू मोटा है
 साग सब्जिया खाया कर
 दूध खूब सटकाया कर 
खूब बड़ा हो जायेगा
 तंदुरुस्त बन जायेगा
 मूंछे खुश हो जाएगी
 झट पट चट उग आयेंगी
 चाचा की बाते सुनकर 
बेमतलब ही चिढ़ता तू .
 अब मत रोना ऊँ ऊँ ऊँ

 माँ , मुझको बहकाओ मत
 बाते ढेर बनाओ मत
 बिल्ला के भी मूंछे है
 पिल्ला के भी मूंछे है
 बिल्ला भी तो छोटा है 
पिल्ला तनिक न मोटा है 
मैंने मन में ठाना है 
मूंछे मुझको पाना है
 नकली ही तुम मगवा दो 
उन्हें लगाकर खुश हो लूँ .
 तब न रोऊ ऊँ ऊँ ऊँ 
तब न पूंछू मूंछ न क्यों ?
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 चित्र : गूगल सर्च से साभार 

 

बेटी

प्रस्तुतकर्ता राज भाटिय़ा

डा० अनिल सवेरा जी की एक अति सुंदर रचना.....

बेटी भी है मुझ को प्यारी
बेटे जितनी ही,
मै बताऊ बातें तुमको
उस की कितनी हे.


छम छम छम छम नाचे जब वो
रॊनक लगती हे,
मोहनी उस की सुरत
सब के मन को लगती हे.


सब कामो मे सब से आगे
वही तो रहती हे
नाम करुंगी रोशन  जग मे
सब से कहती हे

 चित्र लिया गया हे ... mankapakhi.blogspot.com अगर किसी को ऎतराज होगा तो हटा लिया जायेगा,